अंतरंग मित्रों से वार्तालाप

*अंतरंग मित्रों से वार्तालाप*

मैं एक घटना को स्मरण करता हूं... एक बहुत बड़े भवन में ऊपर एक भोज आयोजित था। कुछ मित्रा वहां इकट्ठे  थे, एक साधु भी  आमंत्रित था। वे भोजन में संलग्न थे और चर्चा में संलग्न थे और भूकंप आया।जैसे... अभी यहां भूकंप आ जाए तो मेरा आपको स्मरण भूल जाएगा। पड़ोसी का स्मरण भूल
जाएगा। यहां क्या हो रहा है उसका स्मरण भूल जाएगा। एक ही स्मरण रह जाएगा अपने को बचा लेने का, आप भागेंगे, शायद आप होश में भी नहीं भागेंगे।
शायद भागना भी बेहोशी और मूर्च्छा में होगा। शायद भागते वक्त, भागना शुरू करने के बाद आपको ज्ञात होगा कि आप बैठे थे थोड़ी देर पहले अब भाग रहे
हैं। भागने के पहले स्मरणपूर्वक भी आप ना भागेंगे, भागने के बीच में कहीं आपको बोध् आएगा कि अब आप भाग रहे हैं।... वैसा ही हुआ वह भूकंप
आया, वह भवन कंपा, लोग भागे, वे उस साध्ु की चर्चा को भूल गए जिससे बात होती थी। वहां सीढ़ियों पर भीड़ हो गई। छोटी सीढ़ियां, बहुत लोग! वह जो
मेजबान था जिसने आमंत्राण दिया था । उसने लौट कर देखा कि मित्रा साध्ु का क्या हुआ, अतिथि का क्या हुआ? वह देख कर हैरान हुआ वह साध्ु आंख बंद
किए अपनी ही जगह पर बैठा है। और उसके चेहरे पर भूकंप का कोई भी प्रवाह नहीं है, उसके चेहरे पर कोई रेखा भी नहीं है। वह बहुत घबड़ाया, उसके मन में
हुआ कि आज इस व्यक्ति के पास रुक जाना बड़ा आवश्यक है। इस व्यक्ति के पास रुक जाना इसलिए आवश्यक है कि ऐसा असामान्य व्यक्ति आज तक जीवन में कभी नहीं मिला। जिसे भूकंप के कंप का अनुभव नहीं हो रहा है और जो पांच मंजिल भवन पर बैठा है मृत्यु को निमंत्राण दिए उसके पास रुक जाना उसे जरूरी लगा, वह रुक गया। कोई मिनिट डेढ़ मिनिट के बाद भूकंप समाप्त हुआ। नगर में बहुत भवन गिर गए हैं। नगर में बहुत कोलाहाल है। उस मकान के भी
कुछ हिस्से गिर गए हैं। सब अस्त-व्यस्त हो गया है।
उस साध्ु ने आंख खोली और जहां से चर्चा छूट गई थी, वहीं से प्रारंभ कर दी। उसके मेजबान ने कहा कि मैं हैरान हूं आपको चर्चा का स्मरण है कि कहां टूट गई थी। मैं हैरान हूं कि वह अध्ूरा वाक्य जो रह गया था उसको आप पिफर पूरा कर रहे हैं। लेकिन मुझे कुछ स्मरण नहीं कि आपने पहले क्या कहा, भूकंप के पहले की दुनिया और बाद की दुनिया में मुझे बहुत अंतर पड़ गया है। मुझे कुछ स्मरण नहीं है... अभी मैं कुछ न समझ सकूंगा। मुझे तो एक ही बात पूछनी है अभी यह भूकंप आया लेकिन आप तो बिलकुल अकंप थे। मुझे यह
पूछना है इस भूकंप का क्या कोई असर आप पर नहीं हुआ? उस साध्ु ने जो कहा वह मन के किसी बहुत आंतरिक कोने में रख लेने जैसा है, बहुत संजोकर
रख लेने जैसा है। उस साध्ु ने कहा कुछ वर्ष हुए तब मुझे भी भूकंप आते थे। उस साध्ु ने कहा कुछ वर्ष हुए तब मुझे भी भूकंप आते थेμपिफर मैं अपने भीतर
एक ऐसा आश्रय स्थल पा गया... उस आश्रय स्थल में सरक जाता हूं। वहां तक कोई भूकंप नहीं पहुंचता है। वहीं सरक गया था। अपने भीतर एक ऐसे शांति के
केंद्र को पा गया हूं। जहां बाहर की कोई अशांति नहीं पहुंचती है।

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