जब तक कोई भी अनुभव हो रहा है

जब तक कोई भी अनुभव हो रहा है--सुख का या दुख का--तब तक समाधि पूर्ण नहीं है। जब कोई भी अनुभव नहीं होता, दर्पण तुम्हारी अनुभूति का बिलकुल निर्मल होता है, चित्त-वृति निरोध:, जहां चित्त की सारी वृत्तियां का निरोध हो गया है--वह दशा योग की है। वहां तुम परमात्मा से मिलते हो। उस चौथी दशा में तुम परमात्मा हो जाते हो। तीनि लोक के ऊपरे, अभय लोक विस्तार।
आर वहीं भय मिटता है, इसलिए उसे अभय लोक कहा है। जो दुखी है, वह भी भयभीत रहता है--कि कहीं और दुख न आ जाएं। जो दुखी है, वह भयभीत रहता है कि पता नहीं कब इन दुखों से छुटकारा होगा, होगा भी कि नहीं होगा। जो सुखी है, वह भी भयभीत रहता है कि यह कितनी देर टिकेंगे सुख! अतीत के अनुभव यही कहते हैं कि सुख आते हैं, चले जाते हैं, टिकते नहीं। तो जो सुखी है, भय के कारण जोर से पकड़ता है। जो दुखी है, वह हटाता है। मगर चैन दोनों को नहीं है। जो सुखी है वह भी जानता है कि आज नहीं कल हाथ से छिटक जाएगा सुख। इसलिए पकड़ लो, चूस लो! मगर जितने जोर से तुम सुख को पकड़ोगे, उतने जल्दी छिटक जाता है।
सुख पारे जैसा है; मुट्ठी बांधी कि बिखर जाएगा। फिर बीनते फिरो पूरे फर्श पर और न बीन आओगे। और जिंदगी लोगों की बिखरे हुए पारों को बीनने में ही बीत जाती है। और दुख को तुम जितना हटाओ, उतना तुमसे चिपकेगा। दुख से तुम जितने भागोगे, छाया की तरह तुम्हारा पीछा करेगा। यह हमारी सामान्य अवस्था है। दोनों हालत में भय बना रहता है। दुखी आदमी तो भयभीत होता ही है कि इतना तो मिल गया, पता नहीं, हे प्रभु, और अब क्या होने को है!

ओशो
दरिया कहे शब्द निरवाना

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